पास-पास है, फिर भी जुदा-जुदा

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दिनेश बोथरा
भाई जैसा सैण नहीं, भाई जैसा बैर नहीं। वैज्ञानिकों को यह कहावत कैर की झाड़ियों पर खरी उतरती नजर आई है। फर्क सिर्फ इतना है कि कैर में सैण कम बैर यादा है यानी पास-पास रहते हुए भी उनके गुणधर्म एक-दूसरे से दूर-दूर तक मेल नहीं खाते। वानस्पतिक दुनिया में कैर की यह फितरत अजूबी है। आपको भी यह देखकर हैरानी होगी कि एक झाड़ी में यदि साावन का उन्माद होता है तो पास की दूसरी झाड़ी में पतझड़ की खिंजा झलकती मिलती है। विविधता का यह आलम इसके कई गुणों में देखा गया है, जो बहुत यादा करीब 70 प्रतिशत तक है। जेनेटिक इम्प्रूवमेंट ऑफ इकोनोमिकली इम्पोटर्ेंट स्कर्ब ऑफ एरिड रिजन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, राजस्थान कृषि यूनिवर्सिटी बीकानेर तथा गुजरात कृषि यूनिवर्सिटी बनासकांठा के वैज्ञानिकों ने कैर के विभिन्न पौधों पर पिछले कई सालों तक वॉच किया और पाया कि इस पौधे में अपनी ही बिरादरी के साथ व्यवहार करने का रिवाज बहुत कम है। वर्ल्ड बैंक से वित्त पोषित नेशनल एग्रिकल्चर टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट के अधीन इस अध्ययन का समन्वय कर रहे काजरी के डा. मंजीतसिंह कहते हैं-इस प्रोजेक्ट का मकसद गुगल, कैर, मेहंदी तथा सोनामुखी की झाड़ियों का संवर्धन करना है। कृषि क्रांति ने बहुपयोगी झाड़ियों के वजूद को खतरा पैदा कर दिया है। सबसे यादा नुकसान टे्रक्टरों ने पहुंचाया है। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि इसकी बेहतर किस्म को बचाने और फैलाने का काम किया जाए। कैर पर विस्तृत अध्ययन इसी के तहत किया गया है। वैज्ञानिकों ने राजस्थान तथा हरियाणा के रुक्ष क्षेत्रों में पाए जाने वाले कैर की झाड़ियों का सघन सर्वे किया, जिसके नतीजों में यह उभरा कि कैर में परस्पर विविधता पाई जाती है। इसकी प्रजनन बायोलॉजी भी चौंकाने वाली थी। शायद लगातार अकाल के हालात में खुद के अस्तित्व को बचान के लिए झाड़ियों को तमाम रास्ते अख्तियार करने पड़े हों। इसका प्रजनन रूट, सूकर्स, बीज, कलम आदि सभी विधियों से होता है। जैसा कि डा. सिंह बताते हैं-यह इसको फैलाने में सबसे बड़ा मददगार साबित होगा। इसकी उपयोगिता को समझते हुए खेती करने में फायदे हैं। कम से कम खेतों की बायो फैंस बनाने में इसको तरजीद दी जानी चाहिए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अलग-अलग झाड़ियों में एक ही साल में पत्ते, फूल तथा फल आने का समय भिन्न होता है। ताजुब नहीं कि एक ही पौधे में अलग-अलग सालों में यह चक्र बदल जाता है। आमतौर पर कैर में जनवरी से मार्च, मई से जुलाई तथा अक्टूबर में पत्ते, फरवरी से मार्च, मई-जून, अक्टूबर-नवंबर में फूल तथा मार्च-अप्रैल, जून तथा नवंबर में फल आते हैं, लेकिन ये झाड़ियां आबोहवा और पारिस्थितिकी के अनुरूप अपना यह चक्र बदलती रहती है। हैरानी तो तब होती जब आस-पास की झाड़ियों का चेहर अलग=अलग नजर आता है। इसको करीब से देखने पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कैर की गुदा का वजन, फलों से संबंधित अन्य गुणों तथा बीज के वजन में 49 से 70 प्रतिशत तक विविधिता पाई जाती है, जबकि लंबाई, झाड़ियों में बिखराव में यह विविधता 43 48 प्रतिशत तथा फल की साइज, लंबाई व सौ बीजों के वजन में यह 20 से 26 प्रतिशत तक होती है।

नहीं रहे पनघट

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परंपरागत जलाशयों तालाबों ,कुंओं व बावड़ियों के लिए मशहूर शहर जोधपुर इनके नाम की पहचान खोता जा रहा है। सोलहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी तक जोधपुर के राजा- महाराजाओं व उनके सहायकों ने कुल 703 पारंपरिक जलस्रोत के रूप में तालाब कुंओं व बावड़ियों का निर्माण करवा जनहित में जनता को भेंट किया था। उस जमाने में ये जलस्रोत आमजन की प्यास बुझाने में अहम भूमिका निभाते थे। नहरी पानी की आवक ने इन जलस्रोतों के महत्व को इस हद तक गौण कर दिया है कि अब कई जगहों पर लोगों ने अपने स्वार्थ के चलते इनका वजूद ही मिटा दिया है। बचे हुए जलस्रोत अब केवल धरोहर के नाम पर किसी काम के नही हैं। इनमें पानी आज भी है लेकिन रखरखाव नहीं होने के कारण पानी पीने योग्य नहीं रहा। ठेठ भीतरी शहर से लेकर शहरपनाह को छूने वाले गांवों तक बने ये पारंपरिक जलस्रोत आज अपनी पहचान को मोहताज हो रहे हैं। केवल भीतरी शहर में ही देखें तो चांदपोल के बाहर का क्षेत्र में कम से कम साठ-सत्तर कुंए ,बावड़ियां व तालाब हैं। इन्हें सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के दरम्यान विभिन्न राजाओं और विभिन्न समाज के मौजीज लोगों ने खुदवाया था। आलम यह है कि इन क्षेत्रों में रहने वाली युवा पीढ़ी को इनके नाम तक याद नहीं, जबकि पर्यावरण व पर्यटन की दृष्टि से ये धरोहरें महत्वपूर्ण हैं। चांदपोल दरवाजा से लेकर सूरसागर के बीच वाली रोड पर कई बावड़ियां व कुंए तो अब अवशेष मात्र बन कर रह गए हैं। यहां के स्थानीय निवासियों ने इन्हें कचरे से पाटकर अपने घरौंदे खड़े कर लिए हैं, तो कुछ एक ठिकाने लगाने की तैयारी में हैं। कला व पर्यावरण की दृष्टि से निर्मित ये बावड़ियां इतनी महत्वपूर्ण है कि यदि इन्हें सुव्यवस्थित कर दिया जाए तो ये पर्यटकों की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण हाेंगी ही साथ में स्थानीय लोगों के लिए भी आमोद-प्रमोद के लिए एक अच्छा पिकनिक स्थल बन सकता हैं।
पहले क्या थी व्यवस्था- आज से तीस चालीस पहले लोग पीने का पानी जहां कुंओं से लाते थे , वहीं कपड़े धोने व नहाने के लिए बावड़ियों का पानी काम में लिया जाता था। इसी कारण सभी रहवासी क्षेत्रों में व उसके आस पास कुंओं ,तालाब व बावड़ियों का अस्तित्व बना हुआ था।
क्या हो रहा है अब- आज हालात यह है कि रहवासी क्षेत्र में बने ये पारंपरिक जलस्रोत आधे से ज्यादा तो अपने वजूद में ही नही है, और जो वजूद में है वो किसी काम के नहीं।

लूणी नदी के वजूद पर संकट

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पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख बरसाती नदी लूणी का वजूद संकट में है। नदी का कैचमेंट एरिया अतिक्रमणों और सिंचाई के लिए छोटे-छोटे बांधों के निर्माण से सिमट गया है। जोधपुर में इसकी सहायक नदी जोजरी तो बालोतरा में लूणी नदी का बेसिन रंगाई-छपाई फैक्ट्रियों से निकले प्रदूषित पानी की चपेट में बर्बाद हो गया है। जल अवरोधों के चलते 530 किमी लंबी इस नदी में बारिश का पानी आखिरी छोर तक पहुंच ही नहीं पा रहा। अजमेर जिले से शुरू होने वाली यह नदी बाड़मेर जिले के गांधव से होते हुए गुजरात के कच्छ-रण में समाप्त होती है। मूल रूप से लूणी नदी का प्रवाह क्षेत्र 37 हजार 363 वर्ग किमी हुआ करता था, जो काफी हद तक सिमट गया है। सुकड़ी, मीठड़ी, खारी, बांडी, जवाई, तथा जोजरी जैसी इसकी सहायक नदियां भी अतिक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं। पाली शहर के निकट बांडी नदी भी औद्योगिक प्रदूषण की गिरफ्त में है। बरसाती नदियां होने के कारण इनका बेसिन साल भर सूखा रहता है। ऐसे में बारिश में जल की आवक होने से प्रदूषित बेसिन का दायरा बढ़ जाता है। बारिश का पानी भी रसायनयुक्त होकर नदी के दोनों ओर की वनस्पति को नष्ट कर रहा है। नदी किनारे के कुओं का पानी भी पीने योग्य नहीं रहा है।

प्रमुख बांध जसवंतसागर का कैचमेंट प्रभावित: लूणी नदी के बहाव क्षेत्र में सबसे बड़े बांध जसवंतसागर का तीन दशक पहले तक कैचमेंट एरिया 3, 367 वर्ग किमी हुआ करता था, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप और अन्य स्ट्रक्चरों का निर्माण होने से इसकी भंडारण और स्थिर भराव क्षमता में जबर्दस्त कमी आई है। उद्गम स्थल से बांध के बीच नदी के हिस्से के रूप में मूल कैचमेंट में करीब 62.2 प्रतिशत एरिया में या तो स्मॉल स्ट्रक्चर बन गए हैं या अतिक्रमण हो चुके हैं। नतीजतन, नियमित भराव (फ्रिक्वेंसी ऑफ फिलिंग) में कमी आई है। मूल कैचमेंट 3, 367 वर्ग किमी के मुकाबले इस वक्त केवल 1, 272 वर्ग किमी एरिया ही उपयोगी रह गया है।
बालोतरा में प्रदूषण: कभी बालोतरा क्षेत्र को हरियाली से आच्छादित करने वाली थार क्षेत्र की मरूगंगा लूणी नदी आज जहरीले प्रदूषण की चपेट में है। औद्योगिक नगरी बालोतरा, जसोल व बिठूजा स्थित इकाइयों से निकलने वाले जहरीले पानी ने लूणी की कोख को केमिकलयुक्त जहरीले पानी से लील दिया है। हालांकि फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को ट्रीट करने के लिए बालोतरा, जसोल व बिठूजा में ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं, मगर ये प्लांट सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। इसके अलावा क्षेत्र में संचालित अवैध धुपाई इकाइयों का पानी भी सीधा लूनी में छोड़ा जा रहा है।
बांझ हुई धरती की कोख: बुजुर्ग ग्रामीण उस जमाने को अभी भूल नहीं पाए हैं, जब उनके कृषि कुएं नदी में पानी की आवक होते ही रिचार्ज हो जाया करते थे। आज स्थिति यह है औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषित पानी तिलवाड़ा पशु मेला स्थल से होते हुए सिणधरी क्षेत्र के गांधव तक पहुंच चुका है। लूणी में वर्षभर पड़े रहने वाले केमिकलयुक्त जहरीले पानी के कारण नदी किनारे आबाद कृषि कुओं आधारित खेत बंजर हो गए हैं। रसातल में पहुंचे जहरीले पानी ने धरती की कोख को बांझ बना दिया है।
अतिक्रमण की भेंट चढ़ी नदी की जमीन: लूणी नदी की जमीन पर जगह-जगह अतिक्रमण हो गए हैं। राजस्व महकमे के स्पष्ट नियम-कायदे होने के बावजूद प्रभावशाली अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही। इतना ही नहीं फैक्ट्रियों में पानी की आपूर्ति पूरी करने के लिए नदी की जमीन में निजी टयूबवैल मालिकों ने पाइप लाइनों का जाल तक बिछा दिया है।

उम्मीदों का उजाला

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आप इसे अच्छी खबर कह सकते हैं। क्लीन-एनर्जी के लिए मशक्कत मे जुटे दुनिया भर के वैज्ञानिकों को थार में सूरज का ताप सुहाना लगने लगा है। मरुधरा के बाशिंदों को कल तक मथानिया में विश्व का सबसे बड़ा सोलर पावर प्लांट नहीं लग पाने मलाल था, लेकिन अब उम्मीदों का उजाला चहूंओर फैल गया है। सूरज के ताप से बिजली पैदा करने की होड़ मच गई है। सही मायने में यह श्रेय जाता है केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के वैज्ञानिकों को, जो आज से नहीं सालों से यह दावा करते आ रहे हैं कि थार मरुस्थल सोलर पावर की खान है। कई नामचीन कंपनियों को सोलर पावर प्लांट लगाने के लिए मरुधरा में दस्तक देना इन्हीं दावों का समर्थन करता है। वैज्ञानिक एनएम नाहर की मानें तो देश के शुष्क क्षेत्र का महज एक प्रतिशत हिस्सा हमें ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बना सकता है। देश का तीन लाख बीस हजार वर्ग किमी क्षेत्र शुष्क है, जिनमें 69 प्रतिशत राजस्थान में, 21 प्रतिशत गुजरात तथा शेष दस प्रतिशत पंजाब और हरियाणा में पड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि दो हैक्टेयर क्षेत्र में एक मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। इस लिहाज से यदि समूचे शुष्क क्षेत्र के महज एक प्रतिशत का उपयोग किया जाए तो 1 लाख 60 हजार मेगावाट बिजली पैदा हो सकती है। यह बिजली हमारे मौजूदा उत्पादन से यादा है। शुष्क क्षेत्रों में भी खासकर, बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर पर विशेषज्ञों की निगाहें जमी हैं। वजह है यहां सोलर पावर की सर्वाधिक उपलब्धता। इन क्षेत्रों में औसतन बीस से पच्चीस दिन तक ही बारिश होती है। ऐसे में सूरज देवता साल में सर्वाधिक दिनों तक दर्शन देते हैं। नतीजतन, जोधपुर जिले में 6 किलो वाट्स घंटा प्रति वर्गमीटर सोलर पावर आसानी से मिल जाता है। बीकानेर में यह आंकड़ा 6.3, जैसलमेर में 6.4, बाड़मेर में 6.3, हनुमानगढ़ में 5.5, गुजरात में 5.9 तथा हरियाणा में 5.6 किलो वाट्स घंटा प्रति वर्गमीटर है। शायद यही वजह है कि क्लिंटन फाउंडेशन को सोलर पार्क के लिए यह धरती जोधपुर खींच लाई है।

ऐसे तो कैसे बचेगा भूजल?

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दिनेश बोथरा
सूखे का दंश झेलने को अभिशप्त पश्चिमी राजस्थान के भविष्य में गंभीर जल संकट की त्रासदी ने घर कर लिया है। पुनर्भरण के मुकाबले बेतहाशा भूजल निकासी से हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि जिस रफ्तार से पानी पैंदे बैठ रहा है, उसे देखते हुए वर्ष 2010 के आखिर तक भूजल दोहन की मौजूदा दर बढ़कर 161.70 पहुंच जाएगी।
यह ऐसी स्थिति होगी, जब भूजल संसाधनों पर भीषण दबाव होगा। इन विषम हालात में यदि मानसून ने 2009 की तरह दगा दिया तो स्थितियां बदतर हो जाएंगी। इसका जनजीवन और पशुधन पर क्या असर होगा? इस आशंका मात्र से भूजल वैज्ञानिकों के माथे पर चिंता की लकीरें नजर आने लगी हैं। केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के इंटीग्रेटेड लैंड यूज मैनेजमेंट एंड फार्मिंग सिस्टम डिपार्टमेंट के हैड रह चुके डा. एमए खान के मुताबिक-चिंता होना लाजिमी है, क्योंकि पिछले एक दशक में भूजल गिरावट की चौंकाने वाली तस्व्ीर ने खतरे की घंटी बजा दी है। वर्ष 2001 में भूजल दोहन (भूजल उपयोग विकास दर) का जो अनुमान लगाया गया था, उसके मुकाबले यह करीब तीन गुना यादा रहा। यानी पुनर्भरण योग्य पानी की उपलब्धता जितनी नहीं थी, उसके मुकाबले दोहन यादा हने से असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई है। यह असंतुलन आने वाले सालों में पुनर्भरण व दोहन के बीच खाई पैदा कर देगा। काजरी ने भूजल विभाग के 1988 के आंकड़ों को आधार मानकर वर्ष 1990, 1995 तथा 2000 में पश्चिमी राजस्थान के भूजल संसाधनों का अनुमान लगाया था। इन अनुमानों के परिप्रेक्ष्य में जब 1995 एवं 2001 के भूजल संसाधनों के वास्तविक आंकड़ों को देखा गया, तब पता चला कि यह दर उक्त सालों में 3.22 एवं 3.19 प्रतिशत मानी गई थी, जबकि वास्तविक दर सामने आई 10.52 तथा 8.36 प्रतिशत। यानी यह 1.8 से 3.03 गुना यादा रही। अंधाधुंध दोहन की इस स्थिति को देखते हुए भूजल वैज्ञानिकों ने वर्ष 2010, 2015 तथा 2020 में भूजल संसाधनों का जो अनुमान लगाया है, वह भयावह स्थिति का संकेत देता है। मिसाल के तौर पर 2015 में दोहन की दर 189.28 प्रतिशत तक पहुंचने का अंदेशा है। वहीं 2020 में यह आंकड़ा 221.56 प्रतिशत को छू जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अतिदोहन की स्थिति होगी। इसके चलते पश्चिमी राजस्थान को विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या है मौजूदा स्थिति: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने हाल ही एक अधिसूचना जारी करके विषम और अतिविषम दोहित भूजल दोहन ब्लॉक को निगरानी में ले लिया है। इसके मुताबिक जोधपुर जिले का लूणी व शेरगढ़ ब्लॉक भूजल दोहन के मामले में विषम तथा बालेसर, भोपालगढ़, बिलाड़ा, मंडोर तथा ओसियां अतिविषम श्रेणी में आ गए हैं।

देश के भूगोल को बदल देगा थार

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दिनेश बोथरा

हर साल आधा किलोमीटर की रफ्तार से उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ रहा थार रेगिस्तान आने वाले वक्त में भारत के भू-उपयोग का नक्शा ही बदल देगा। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) की ताजा रिसर्च में यह खुलासा हुआ है कि कल तक राजस्थान की पहचान रहे थार रेगिस्तान ने अब हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश तक अपने पांव पसार लिए हैं। रेतीली मिट्टी के फैलाव के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी मृदा का ह्रास इस हद तक बढ़ गया है कि कृषि और वानिकी पर आजीविका चला रहे साठ प्रतिशत लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होने की आशंका पैदा हो गई है। इसरो ने पहली बार देश की भू संपदा के डिग्रेडेशन (ह्रास) स्टेटस का मैप तैयार किया है। इसके लिए भारतीय उपग्रह आईआरएस पीसी-1 रिसोर्ससेट पर स्थापित एडवांस्ड वाइड फील्ड सेंसर से समय-समय पर ली गई सेटेलाइट इमेज का गहन विश्लेषण किया गया। विश्लेषण के आधार पर तैयार मैप से संकेत मिलते हैं कि पूवी घाट, पश्चिमी घाट तथा पश्चिमी हिमालय सतह से नीचे जा रहे हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि देश के 32 प्रतिशत भू-भाग का बुरी तरह ह्रास हो चुका है। इसमें से सर्वाधिक 24 प्रतिशत रेगिस्तानी क्षेत्र है। राजस्थान राज्य तो जबर्दस्त मरुस्थलीकरण की चपेट में है। राष्ट्रीय मृदा सर्वे और भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो का कहना है कि थार रेगिस्तान के फैलाव का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि 1996 तक 1 लाख 96 हजार 150 वर्ग किमी में फैले रेगिस्तान का विस्तार अब 2 लाख 8 हजार 110 किमी तक हो चुका है। अरावली पर्वतशृंखलाओं की प्राकृतिक संपदा को भी नुकसान पहुंचने से भूमि ज्यादा बंजर हुई है। यहां लोगों ने जलावन और जरूरतों की पूर्ति के लिए जंगलों पर कुल्हाड़ी चलाई है। गंगा के मैदानी क्षेत्रों, हरियाणा, पंजाब, उप्र तथा गुजरात के तटीय क्षेत्रों में भी लवणीयता बेतहाशा बढऩे से उत्पादकता कम होने की आशंका जताई गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह माइनिंग, वानिकी ह्रास तथा रेगिस्तान का विस्तार हो रहा है, उससे आने वाले सालों में देश के भू-उपयोग का नक्शा बदलने से इंकार नहीं किया जा सकता। इस समय देश की 9.47 मिलियन हैक्टेयर भूमि बंजर हो चुकी है। बारिश में हर साल कमी और अकाल की विभीषिका से चोली-दामन का साथ होने के कारण भी भविष्य में स्थितियां बिगडऩे की आशंकाएं हैं।

और ग्लेशियर भी हो रहे पानी-पानी

थार रेगिस्तान से उठने वाले बवंडर हिमालय के ग्लेशियर को पानी-पानी कर रहे हैं। अब तक ग्लेशियर पिघलने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को ही जिम्मेदार ठहरा रहे वैज्ञानिकों ने कहा है कि थार से उठने वाले अंधड़ के धूल कण बर्फ को पानी बनाने के सबब बने हुए हैं। दरअसल, यूरोपियन और अमेरिकन रिसर्च के बाद ग्लेशियर पिघलने के कारणों का पता लगा रहे भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे एक प्रमुख फेक्टर माना है। सेटेलाइट स्टडी के आधार पर पता लगा कि अरब प्रायद्वीप के अनेक हिस्सों के साथ-साथ थार रेगिस्तान से तेज तूफानी हवा के साथ उडऩे वाले धूल के कण हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड से लगते हिमालय से टकरा रहे हैं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के डा। रमेश पी सिंह ने आईआईटी कानपुर में रिसर्च के दौरान पाया कि जिस जगह से बर्फ के पिघलने की रफ्तार तेज है, वहां बर्फ में रेतीली मिट्टी के कण पाए गए हैं। इन कणों के साथ बर्फ में लोहे या अन्य खनिज मिलते रहते हैं। बर्फ की संरचना में यह मिश्रण सौर विकिरणों का सर्वाधिक अवशोषण करता है। नतीजतन, बर्फ पिघलने लगती है। प्री-मानसून सीजन में उठने वाले अंधड़ से उत्तर-पश्चिम का हिमालय ज्यादा प्रभावित होता है। हालांकि अब तक वैज्ञानिक सर्दियों में होने वाले हिमपात के दौरान अंधड़ के असर का अध्ययन नहीं कर पाए हैं, क्योंकि इस दौरान के ग्राउंड मैट्रोलोजिकल डेटा का विश्लेषण नहीं हो पाया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके अलावा पिछले तीस सालों में गंगा के मैदानी इलाकों के साथ-साथ उत्तरी भाग में बायोमास से निकली कालिख भी हिमालय को प्रदूषित करने के अलावा ग्लेशियर पिघलने का कारण बनी हुई है।

अब नजर नहीं आता इंडियन कैमेलियन

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दिनेश बोथरा
जीव-जंतुओं की बिरादरी पर आई शामत का यह चौंकाने वाला उदाहरण है। देश में लुप्त प्राय: होने के कगार पर पहुंच चुके इंडियन कैमेलियन गिरगिट की खूबियां ही उसकी जान की दुश्मन बनी हुई हैं। सर्चलाइट सरीखी आंखों पर टोपीनुमा सर से सहज आकर्षण के बीच जहरिले होने की आशंका से ग्रामीण इसका वजूद मिटाने पर तुले हुए हैं। राजस्थान के शुष्क इलाकों में बहुत कम नजर आने वाले इंडियन कैमेलियन को देखते ही देखते कुछ अरसे पहले देसूरी के ग्रामीणों ने जहरीला समझ कर मार दिया था। विचित्र काया से लोगों का ध्यान एकाएक उसकी तरफ गया और लोग उस पर पिल पड़े। यह अकेला मामला नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में अमूमन खेत में नजर आने के कारण यह नादानी का शिकार बनता आया है। जैसा कि प्राणि सर्वेक्षण विभाग के पूर्व संयुक्त निदेशक डा. एनएस राठौड़ कहते हैं-इंडियन कैमेलियन मध्य व दक्षिण के रायों सहित समूचे गुजरात में पाया जाता है, लेकिन इसे राजस्थान में सबसे पहले 1998 में जोधपुर की भोपालगढ़ तहसील में रिपोर्ट किया गया था। चूंकि शुष्क क्षेत्रों में इसकी उपस्थिति वैसे भी बहुत कम है, ऐसे में अज्ञानतावश मारे जाने की घटनाएं चिंता पैदा करती हैं। आमतौर पर गांवों में लोग इसे गिर्रडा के नाम से जानते हैं, क्योंकि इसके चलने की रफ्तार बहुत कम है। इसके न दौड़ पाने की एक खास वजह है, वह यह कि इसके हाथ व पांच की अंगुलियां जुड़ी हुई हैं। दिलचस्प यह है कि इसी कारण गांवों में लोग आज भी धीमे चलने वाले को गिर्रडा जैसे चलने का उलाहना देने से नहीं चूकते। प्राणि वैज्ञानिकों के अनुसार इंडियन कैमेलियन के शरीर पर पीले धब्बेनुमा हरा रंग तथा बड़ी-बड़ी सर्चलाइट नुमा आंखें होती हैं, जो चारों दिशाओं में घुमाई जा सकती है। शारीरिक विचित्रताआें से भरे इस जीव के जीभ की लंबाई 4 से 5 इंच तक होती है, जो जरूरत पड़ने पर और बड़ी हो सकती है। यह मुख गुहा में स्प्रिंग की तरह गोल बनाकर रखी जाती है। अग्रभाग कूपनुमा होने के साथ जीभ पर लिलिसा पदार्थ लगा रहता है, जो कीट-पंतंगे पकड़ने के लिए मददगार रहता है। राठौड़ कहते हैं- चुटकी में रंग बदलने की क्षमता रखने वाले इंडियन कैमेलियन की पूंछ भी उतनी ही लंबी होती है, जो स्प्रिंग की तरह गोल रहती है। इसकी मदद से यह टहनियां पकड़कर लटकते हुए चलता-फिरता है। इस लिहाज से इसके शरीर व पूंछ की लंबाई कभी-कभी 14 से 16 इंच तक पहुंच जाती है। उन्होंने कहा, इसके मुंह में न तो विष ग्रंथियां होती हैं और न ही इसमें अंशमात्र जहर होता है। कीट-पतंगे भक्षण के कारण यह किसानों का मित्र है। प्राणि वैज्ञानिक चिंतित है कि यदि इसी तरह नासमझी में हम जीव-जंतुओं का शिकार करते रहे तो एक दिन इनका वजूद मिट जाएगा।